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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 74, दिसम्बर(प्रथम), 2019

मजदूर
(लावणी छंद)

महेन्द्र देवांगन माटी

माथ पसीना टप टप टपके , तब रोजी मिल पाता है । काम करे वह दिन भर साथी , तब रोटी वह खाता है ।। गर्मी सर्दी बरसातों की , वह परवाह नहीं करता । बाजू में है ताकत उसकी , नहीं किसी से वह डरता ।। फौलादी है सीना उसका , चट्टानों को तोड़े हैं । अगर ठान ले मन में तो वह , नदियों के मुख मोड़े हैं ।। खड़ा करे वह महल अटारी , खुद कुटिया में रहता है। सबको अन्न खिलाकर भी वह , भूख प्यास सब सहता है ।। नहीं रहे मजदूर अगर तो , काम सभी रुक जायेगा । थम जायेगी सारी धरती , भोजन मिल ना पायेगा ।।

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