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वर्ष: 3, अंक 50,दिसम्बर(प्रथम)  , 2018



तड़प


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


"कुछ साल पहले तुमने मुझसे कहा था कि कुछ भी चित्रकारी करना परन्तु मासूमियत को अपने चित्रों में मरने मत देना | फिर यह सब क्या है सुरेखा ?" नाराजगी जताते हुए अख़बार डायनिंग टेबल पर पटक दिया|

"क्या तुम्हारे अंदर की वह तड़प मर गयी | क्या हमारे बच्चे न होने की वजह से तुम्हारा दिल पत्थर का हो गया ? कुछ बोलो तो सही !"

सुरेखा ने खौलती हुई चाय से नजरें उसकी ओर उठाई, लेकिन मौन रही |

"चित्र भी बनाने से मना करने वाली मेरी सुरेखा मेरे सामने आज ये कैसा चित्र उपस्थित कर रही है ! दो नन्हें मासूम ठण्ड में सिकुड़े हुए एक दूजे से लिपटकर आसमान के नीचे रात गुजारे | उनका आशियाना तुमने क्यों टूटने दिया |"

चुप्पी अचानक टूटी - "तुम खामखाँ क्रोध कर रहे हो | इस चित्र के साथ अख़बार की भड़काऊ हेडिंग नहीं, बल्कि कुछ अंदर का भी पढ़ लो पहले |" चाय कप में निकालती हुई सुरेखा बोली | चाय की भाप और तल्ख भाषा से वातावारण में गर्माहट फैल गयी |

"ऐसी तस्वीर पेश करके अख़बार वाले हम पर कीचड़ नहीं उछाल सकते | इन्हें इतनी ही हमदर्दी थी तो अपने घर की छत क्यों नहीं मुहैया करवा दी | सरकारी जमीन पर गलत तरीके से अतिक्रमण कर रखा था | महीनों नहीं बल्कि सालों से आगाह किया गया था | दुसरे इन लोगों को पता नहीं था क्या कि जो कर रहें वह गलत है !" आँखे संजय से भी कुछ याद दिलाते हुए जैसे सवाल पूछ रही थीं |

"जब अतिक्रमण की एक ईट भी लगती है तो सम्बन्धित विभाग सोता रहता है क्या ?"

"देखता तो है, लेकिन भावनाएं जाग्रत रहती हैं | इस लिए चुप रहता है|"

"अब भावनाएं कैसे मर गयीं !"

"मरी नहीं, लेकिन अति होने से जाग्रत भी न रह पायीं | पहले टेंट, फिर मिट्टी, फिर सीमेंट के मकान बना लेतें लोग |"

" कमी तो तुम्हारे विभाग की भी थी न ! "

"हाँ थी, किन्तु हमारी कमी को अपनी ताकत कैसे समझ लेते लोग |" कहकर तिरक्षी नजर डाली संजय पर |

संजय को उसकी आँखों में विद्रोह की चिंगारी साफ़ दिख रही थी |

पिता के दबाव में एक रिश्ते के लिए बस हामी भरने के अपराधबोध से उसकी नजरें नीची हों गयीं | उसने अख़बार उठाया और उसके चीथड़े-चीथड़े करके डस्टबिन में डाल आया |


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