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वर्ष: 3, अंक 50,दिसम्बर(प्रथम)  , 2018



दाएँ हाथ का शोर


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


चेतन का फेसबुक अकाउंट पुरानी यादों को ताज़ा कर रहा था । आज अचानक उसको वे तस्वीरें दिखी, जो उसने पांच साल पहले पोस्ट की थी। दूसरों की मदद करते हुए उसकी ऐसी तस्वीरों की अब उसे जरूरत ही कहाँ थी। उसने स्क्रॉल कर कर दिया ।

कभी समाजसेवा का बुखार चढ़ा था उस पर। 'दाहिना हाथ दें तो बाएं को भी न पता चले, सेवा मदद ऐसी होती है बेटा।' माँ की दी हुई इसी सीख पर ईमानदारी से चलना चाहता था वह |

लोग एनजीओ से नाम, शोहरत और पैसा कमा रहे थे और वह, वह तो अपना पुश्तैनी घर तक बेचकर किराये के मकान में रहने लगा था।

पत्नी परेशान थी उसकी मातृभक्ति से | कभी-कभी वह खीझ कर बोल ही देती थी कि 'यदि मैं शिक्षिका न बनती तो खाने के भी लाले पड़ जाते' चेतन झुंझला कर रह जाता था। उसी बीच उसने गरीब बच्चों को खाना खिलाते, उन्हें पढ़ाते हुए तस्वीरे पोस्ट कर दी थी।

यादों से बाहर आ उसने पलटकर फेसबुक पे वही अल्बम खोल लिया। तस्वीरों को देखकर बुदबुदाया- "सोशल साइट्स न होती, तो क्या होता मेरा। यही तस्वीरें तो थी, जिन्हें देखकर दानदाता आगे आये थे और पत्रकार बंधुओ ने अपने समाचार पत्र में जगह दी थी। फिर तो मैं दूसरों को मदद करते हुए सेल्फ़ी लेता और डाल देता था फ़ेसबुक पर, ये कारनामा फेसबुक पर शेयर होता रहा और मैं प्रसिद्धी प्राप्त करता रहा। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा ।"

"अरे! कहाँ खोये हो जी ! कई लोग आएँ हैं। " पत्नी की आवाज ने उसे आत्मग्लानि से उबारा।

"कहीं नहीं! बुलाओ उन्हें।"

"जी चेतन बाबू, यह चार लाख रूपये हैं। हमें दान की रसीदें दे दीजिए, जिससे हम सब टैक्स बचा सकें।" कुर्सी पर टिकते ही बिना किसी भूमिका के सब ने एक स्वर में बोला |

"हाँ, हाँ ! क्यों नहीं, अभी देता हूँ।" रसीद उन सबके हाथ में थमाकर वह मुस्कराया । अचानक माँ की तस्वीर की ओर देखा आँखे झुकी फिर लपकर उसने तस्वीर को पलट दिया |


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