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वर्ष: 3, अंक 50,दिसम्बर(प्रथम)  , 2018



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राजीव कुमार


उफनती लहरों का दंश तटबंधों को भी भोगना पड़ा था। आसपास के गांवों को बाढ़ से बचा पाने में तटबंध नाकाम हो चुके थे। सड़के तो क्या ऊंचे-ऊंचे चबूतरे भी जलमग्न हो गए थे।

सारे लोग विधि का विधान मानकर अपनी-अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे थे। कोई अपना छूट न जाए, बह न जाए, इसी बात की अफरातफरी मची थी।

सारे लोगों का कोई न कोई था, अगर बेसहारा थे तो केवल दो ही लोग-भिखारिन और दस साल का अनाथ बच्चा गोपाल।

गोपाल ने आवाज लगाई, ‘‘बचाओ-बचाओ, अब पेड़ भी डूब जाएगा।’’

सब ने देखा कि गोपाल पेड़ पर चढ़ा हुआ है, और पानी की सतह उसके पैर को छू रही है, मगर अपनी जान और अपनों की जान किसको प्यारी नहीं?

भिखारिन भी ऊंचे टीले पर बैठकर आवाज लगा रही है, ‘‘बचाओ-बचाओ, हमको भी अपने साथ ले चलो।’’

मगर उसकी आह सुनने वाला कौन था? भिखारिन सोचने लगी कि जब गांव वाले सुख में थे तो एक रोटी और एक रुपया के लिए भी तरसाते थे, तो खुद को खतरे में डालकर मेरी जान क्यों बचाएंगे?

अचानक भिखारिन की नजर छोटे से पेड़ पर चढ़े अनाथ बच्चे गोपाल पर पड़ी तो चिंतित हो गई और आवाज लगाने लगी, ‘‘अरे हमको न सही, मगर इस बच्चे को तो बचाओ।’’ दो-तीन मिनट इंतजार करने के बाद, वो अपनी लाठी टटोलने लगी, लाठी तो कब की बह चुकी थी। गिरते-बजड़ते छाती तक पानी में लड़खड़ाते, खुद को बचाते, बच्चे गोपाल तक आ पहुंची। ऊंचे टीले पर ले जाकर बच्चे को पुचकारने लगी।

गोपाल मां की गोद में सिर रखकर सुरक्षित महसूस कर रहा था और भिखारिन उसके बाल पर हाथ फेरते हुए उसको सुरक्षित और खुद को मातृत्व का अहसास करा रही थी।


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