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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



चेहरे


पवन अनाम


  
पिछले साल में 
बना था छप्पर 
सूखे हुए खिपों का,
पापा ने बड़ी तरतीब से 
जमाया था उन्हें,
किसी इमारत  की नक़्क़ाशी भी 
फ़ीकी पड़ जाए जैसे,
माँ ने कहा था पापा से,
खींप की खेप तंगळी से 
बढ़ाते हुए
" इस बार की ही तो बात है"
माँ, पापा एक साथ देखने लगे मेरी तरफ,
मैं समझ गया उनके मन 
की बातों को,
छप्पर अब पुनः खींप की मांग के 
लिए हड़ताल पर उतर आया है,
सीमित कमरों में बना हुआ 
मकान,
कब से मुक्कमल घर होने की 
आशा लिए बैठा है।
पापा ने रखकर 
कुछ ईंटे आज 
फिर बना दिया 
नाम का रसोईघर,
माँ के हाथो से रिसती लोई,
पापा का फटा कुर्त्ता
पूछ लेते हैं उस सवाल का उत्तर 
जिनके लिए माँ पापा मौन थे।
सुबह होते ही पापा निकल जाते हैं
शाम कमाने, 
और माँ खेत के रण में 
उतर पड़ती है हमारे लिए लड़ने,
मैं पढ़ लेता हूँ दो पेज और
उन चेहरों को याद करके।।
  

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