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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



पढना जरूरी नहीं था


डॉ.नवीन दवे मनावत


  
जब किसी अनपढ को 
देखता हूं मैं 
सभ्यता की 
और संस्कार की बात करते 
तब लगता है 
पढना जरूरी नहीं था
जब देखता हूं मैं 
पढे -लिखे और 
तथाकथित सभ्य को 
तो भी लगता है 
पढना जरूरी नहीं था
जब देखता हूं
पढे -लिखे इंसान में 
मरी हुई संवेदनहीन दृष्टि
तब भी लगता है
पढना जरूरी नहीं था
जब नाचते देखता 
अन्याय के आगे 
इंसान को तो
समझता हूं 
पढना जरूरी नहीं था
तो आखिर 
जरूरी  है क्या?
बस इंसान बनना !
और पढ़- लिख कर 
उस अध्ययन 
का सदुपयोग करना 
सभ्य बनना 
राष्ट्र हित में लगे रहना 
या आतंकवाद फैलाना
निर्बोध बन निर्दोष लाशे बिखेरना 
या जातिवाद या 
समन्वयहीन  समाज का निर्माण करना
  

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