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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



गांव रहने दो.....


डॉ.नवीन दवे मनावत


  
गांव रहने दो!
जहां आज भी तन्मयता 
से कूकती है कोयलें,
स्वच्छंद विचरती है 
गिलहरियां
और चहचहाती चिडियां
एक लय में
जहां पलती है
रंभाती गायें
अति प्रसन्न मुद्रा में,
जहां विचरते है तुरंग 
अपनी ही मौलिक चाल में
जहां महिषी का दूध 
है स्वच्छ 
शहर की निस्तेज प्लास्टिक की
थेलियों सा नहीं।
जहां आतिथ्य
की पराकाष्ठा
नहीं ,पावन तीर्थ सा है।
और परमात्म श्रद्धा
आह!
संपूर्ण ब्रह्मांड 
आ पहूचा हो गांव में 
जहां दर्शन होते है
उसी देवभूमि भारत के
गांव है 
वहीं भारत की
परिभाषा है
जिस का गर्व कर रहे
हम विश्वपटल पर
  

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