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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



सुनी सुनाई बात


महाराजा जीलानी


 
शीश महल से बाहर निकले
पत्थर की बरसात हुई,
कुछ हाथों में लेकर छिपे दिखे
उनसे तो हँसकर बात हुई..!!!


नज़र गयी जब इधर उधर
तो अपनो के भी नक्श मिले,
कुछ हाथ बंटाने को लपके
कुछ मौके पर भी घात हुई...!!


कुछ बातों से दिल को बहलाते
कुछ खट्टी मीठी बात सुनाते,
कुछ हमदर्दी के बोल सुने
कुछ पीछे से भी बात हुई....!!


सब कुछ देखा इन आँखों ने
न अंसुवन की बरसात हुई,
सब वक्त की हेरा फेरी थी वो
जो इतनी गहरी रात हुई...!!

सब चले गए हमको बहलाकर,
इक नीलगगन के तारे देकर,
हम रात रात भर बैठे रहते
लेकिन न मुलकात हुई...!!!

फ़िर घायल हाथों से चुन चुन कर 
सब रेज़ा रेज़ा एक किया,
फ़िर ख़्वाबों का वो शीशमहल
एक सुनी सुनाई बात हुई.....!!

एक सुनी सुनाई बात हुई..

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