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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



राधा काहे


लवनीत मिश्रा


 
स्वयं प्रकृति होकर काहे,
मृत्यु लोक अवतार लियो,
हे! राधा काहे तुमने,
देवी हो दुख स्वीकार कियो,
गोलोक में राधा तुमने,
संग कान्हा, नित विहार किया, 
फिर राधा किस कारण तुमने,
कान्हा को जग में त्याग दिया,
सुन ताना सब सखियन का,
राधा हंसकर इतना बोली,
देह रूप सब मिथ्या है,
सब लीला है उनकी भोली,
राधा कृष्ण कोई भिन्न नही,
एक दूजे की परछाईं है,
कहो सखी ऐसी जोडी की,
होती कभी विदाई है।
 

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