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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



कशमकश


लवनीत मिश्रा


 
ना देखो ख्वाब ऐ हमदम,
यह झूठी बात है सारी,
हकीकत आईना है वो,
जो हकीकत दिखाती है,
लगा कर बेडियाँ सबने,
कदमों को थाम रखा है,
कतर के पंख अरमान के,
कहें अंजाम अच्छा है,
एक अरसा गुजरा है, 
भरकर ख्वाब आखों में, 
इन्हे छोडना ऐसे आसान नही होगा,
दुखेगी रूह अंदर से,
तड़प जाएगा दिल तेरा,
संभलने में मेरे हमदम,
थोड़ा कोहराम तो होगा,
ना देखो ख्वाब ऐ हमदम,
यह झूठी बात है सारी,
हकीकत आईना है वो,
जो हकीकत दिखाती है।
 

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