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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



व्रत


लालजी सिंह यादव


 
व्रत धारण कर मनुज क्या हो गया निष्पाप, 
हो गया क्या नष्ट उसके जीवन का परिताप।  

जीवन में हो सादगी जो शुद्ध हो अन्तःकरण, 
मिल गया परिणाम उसको हो गया शुद्धिकरण।   

जिंदगी में व्रत जिसने ले लिया हो कर्म का , 
पढ़ा हो जो पाठ इंसानियत के धर्म का।

पा लिया हो पार जिसने रूढिवादी रीत से , 
जोड़ा हो जो नाता सहिष्णुता  और प्रीत से।

हो गया फिर व्रत पूर्ण उस इंसान का,  
तोड़ दिया बंधन जिसने अंधविश्वास का । 
 

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