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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



मेरे पिता


कुन्दन कुमार


 
वर्षों से रात के सन्नाटों में 
ढूंढ रहे थे मुझको वो मेरे पिता 
बड़े जतन से निकलते वो घर से 
जब भीड़-भार से विरक्त सारा रस्ता 
मानाने रूठे हुए दिल के टुकड़े को 
जिसके सापेक्ष हर शै सस्ता |

वो शहर की ठिठुरन भरी रात 
गांव की वो तीखी बरसात 
मधपान सी मादकता बदन में 
होगी आज उनकी मुलाकात 
आश उजागर नित्य ये मन में 
फिरे न क्यों पतझर की पात |

दिल विचलित न कभी ज्ञात कर 
नैन थके क्या मिले ध्यान कर 
भाव उपलषित नगण्य रूह में 
अंतकाल मुड़ उन्हें त्याग कर 
मिलेगा क्या गर सम्मुख भी तेरे 
रुष्ट न हो कहीं निर्बल विचारकर |

न जान कमर में पग भी डगमग 
बढ़े जा रहे फिर भी प्रतिपल 
जीवन की उम्मीद यही बस 
नैन थके निहार मुख शतदल 
बिसरे कल लौट आएं फिर 
ढूंढ अभी आभा में हरपल |

झिंगुर की फुफकार चीरकर 
शोर ब्याप्त कैसा उर-भू  पर 
पगचाप उड़े जैसे कोई भागे 
ये कौन लहू में हाँथ डालकर 
गुजर गया आँखों से मेरे 
सिने में कोई एक जख्म दफ़न कर |

लौट पड़े मेरे वो पिता 
देख मुझे कुछ भी न कहा 
मन में भरे जीवन की ब्यथा 
ज्वाला धधका पुरजोर वहां 
मुस्काती जहाँ थी मेरी काया 
तोड़ चले मुझसे हर नाता |

जो हाँथ किये हो अनाथ किसी को 
सींच न सकता पुष्प वही जो 
बिंदियों का हो बना जो दुश्मन 
हो फाड़ें जिसने ममता के दामन 
आशीष को न ये हाँथ उठेगा 
माथे पे जिसके दाग लहू का |
 

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