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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



बचपन की यादें


गरिमा


 
बचपन की यादे कितनी अच्छी होती है,
आज उन यादो को ताजा करना अच्छा लगता है।
कहा खो गया वो बचपन वो हसीन दिन,
जब न होती थी कोई फ़िक्र
खेल में जिंदगी के दिन बीतते थे,
न पढ़ने की फ़िक्र न कुछ करने की फ़िक्र,
पापा की डाट खाना माँ का लाड
सब बहुत याद आता है।
अब सब कुछ कही खो गया है,
न वो बचपन रहा और न वो लाड रहा
वो स्कूल जाना और माँ के हाथ का पराठा खाना,
सब कुछ याद आता है।
बड़ो के बाते सुनना उस को हसी में उड़ाना,
फुर्सत में दादी से कहानी सुनना
सब बहुत याद आता है।
अब न वो नानी दादी की कहानी रही
न वो माँ के हाथ का पराठा रहा
न वो लाड रहा,
सब कुछ टीवी मोबाइल पर सिमट कर रह गया है।
माँ के हाथ के खाने ने फ़ास्ट फ़ूड ने ले ली है,
बचपन बहुत याद आता है।।
 

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