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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



हाइकु


अशोक बाबू माहौर


 
धुंध शहर 
जीवन घुट रहा 
मलते आँखें।

पानी दूषित 
व्याकुल मन दुखी 
शीतल जल।

पैदल चलें 
पाँव ठेठ भरी है 
फटी बिमाई ।

कागज हाथ 
लिखा कुछ नहीं है 
कलम पास।

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