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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



प्रेरणा गीत


नवीन कुमार


  
ख्वाबों की बिंदी, उमंगों का गजरा,
सपनों की काजल, लगाए चली मैं ।
हो राहें कठिन, लक्ष्य दुर्गम भी तो क्या,
चुनौती की लाली, लगाए चली मैं ।।
हँसे लोग बेशक, कहें चाहे कुछ भी,
बढ़ती चली मैं, लिए लक्ष्य मन में,
हूँ गुड़िया तुम्हारी, मेरे मम्मी-डैडी,
ना हारी, ना हारूँगी, जीवन सफर में ।।

गरीबी ने जीना मुझे है सिखाया,
मजबूरी ईरादों को पुख्ता किया है ।
ना भटकूँ कभी मैं, हो मायुस पथ से,
जरूरत ने मेहनत को अपना लिया है ।।
बदनशीबी की बारिश में भींगीं हूँ फिर भी,
चलती चली मैं, मगन अपनी धुन में,
हूँ गुड़िया तुम्हारी, मेरे मम्मी-डैडी,
ना हारी, ना हारूँगी, जीवन सफर में ।।

घिरी मैली नजरों की काली घटा हो,
या आँधी जमाने की दकियानुसी की ।
अवरोधक बनें बेशक संकीर्ण विचारें,
ना परवाह है लोगों के कानाफुसी की ।।
छटेंगें कभी तो कुरीति के बादल,
बढ़ती चली मैं, लिए लक्ष्य मन में ।
हूँ गुड़िया तुम्हारी, मेरे मम्मी-डैडी,
ना हारी, ना हारूँगी, जीवन सफर में ।।

चकाचौंध दुनिया की मोहक अदाएँ,
कर सके मुझको विचलित, ये संभव कहाँ है ?
हो बाहें फैलाए बुराई की लपटें,
मैं मंजिल से भटकूँ, ये मुमकिन कहाँ है ?
एक आशा का दीपक जलाए निरंतर,
गुनगुनाती चली मैं, नवीन गीत मन में ।
हूँ गुड़िया तुम्हारी, मेरे मम्मी-डैडी,
ना हारी, ना हारूँगी, जीवन सफर में ।।
  

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