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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



मैं


प्रीती श्री वास्तव


 
तुम प्रणय हो प्रेम का मैं तकरार हूं।
तुम सफर हो इश्क का मैं इकरार हूं।।

जला दो प्रेम दीप लौ बुझने न पाये।
तुम प्रेम की अनुभूति मैं साकार हूं।।

नफरतो के इस वियाबान शहर में।
प्रेम दीप जलाओ तुम मैं बेकरार हूं।।

सबकी धड़कनो में हो रौब इसका।
तुम हाथ उठाओ मैं भी ललकार हूं।।

कदम कदम पे हो साथ तेरा मेरा।
तुम माथे का तिलक मैं उपहार हूं।।

टूटे न कभी ये डोर जिन्दगी की।
पुष्प हो तुम मेरे मैं गले का हार हूं।।

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