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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



द़ागे हवस


पीताम्बर दास सराफ "रंक"


 
द़ागे हवस अभी तक ज़िन्दा है,लड़कियां रोज़ कहती
फांसी मिले गढ़ी पर दरिंदे के,लड़कियां रोज़ कहती।१

कहतीं रहें,हमें करनी है जिरह,यही था सही मे
हाॅ॓ हाॅ॓,यही शख्स ने किया हमरे,लड़कियां रोज़ कहती।२।।

कैसे कहो,यही वहशी था जिसनेतुमसे ज़बरन किया था
सच में,यही शख्स हमको पीटे,लड़कियां रोज़ कहती।३।।

अच्छा,किया क्या ज़बरन,बात तो बतानी पड़ेगी
डाक्टरी में लिखा सब कुछ तो है,लड़कियां रोज़ कहती।।४।।

प्रकरण बार बार चला"रंक" लड़कियां मर गईं वे
आती नस्ल भी लड़ रहीं,फांसी दे,लड़कियां रोज़ कहती।।५।।

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