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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



इंसान हो तो


नरेंद्र श्रीवास्तव


 
इंसान हो तो फिर ईमान की बात कर।
यूँ न बेवजह इंसान पर नहीं घात कर।।

छल,कपट,छीना-झपटी, ये लूटमार।
चैन से सोने देते क्या तुमको रातभर?

प्रेम की दौलत से बढ़के यहां कुछ नहीं।
लो लगी शर्त मेरी,चलो इसी बात पर।।

भेद क्या ?जब खून सब में एक- सा।
पाल न फिर मैल,दिल को साफ कर।।

दें वतन को जिंदगी, एकता के नाम पर।
मैं बढ़ाता हाथ, तू भी अपना हाथ कर।।
 

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