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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



आग लिख रहा हूँ


डी एम मिश्र की ग़ज़लें


 
प्राणों में ताप भर दे वो राग लिख रहा हूँ 
मैं प्यार के सरोवर में आग लिख रहा हूँ

मेरी जो बेबसी है, उस बेबसी को समझो
उजडे़ हुए चमन को मैं बाग लिख रहा हूँ

दामन पे मेरे जाने कितने  लहू के छींटे
धोया न जा सके जो वो दाग लिख रहा हूँ

दुनिया है मेरी कितनी ये तो नहीं पता, पर
धरती है मेरी जितनी वो भाग लिख रहा हूँ

कितने अमीर होंगे दस बीस फ़ीसदी बस
कमज़ोर आदमी का मैं त्याग लिख रहा हूँ

सब लोग मैल अपनी मल - मल के धो रहे हैं
असहाय साबुनों का मैं झाग लिख रहा हूँ
		 
 

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