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वर्ष: 3, अंक 50, दिसम्बर(प्रथम) , 2018



बाल दिवस


कवि जसवंत लाल खटीक


 
बच्चे होते है मन के सच्चे 
गंगा सा पवित्र होता है मन 
फिर से जीने का मन करता 
कोई तो लौटा दे वो बचपन 

सुबह सवेरे सब स्कूल जाते 
साथ में बैठ के टिफिन खाते 
पलभर के होते लड़ाई-झगड़े 
फिरसे हम सब एक हो जाते 

मिलझुलकर सारे खेल खेलते 
कभी हारते और कभी जीतते 
भेदभाव जाति धर्म मिटा कर 
हंसते -खेलते  वो दिन बीतते 

कक्षा कक्ष में खूब मस्ती करते 
कागज के हवाई जहाज उड़ते 
चाहे हमेशा गुरुजी डंडे मारते 
पर वो रिश्ते बड़े मजबूत जुड़ते 

सजा एक को मिल जाती तो 
दोस्त भी साथ में सजा काटते 
साथ में मुर्गा बनने का मजा 
और प्यारा सा अहसास बाँटते 

गिल्ली डंडा और कंचे खेलते 
छुपन छुपाई देर रात खेलते
सच्चे मन और यारी दोस्ती से
एक दूजे का दुख सुख झेलते

अब वो प्यारा बचपन नही रहा
डिजिटलयुग ने बचपन खा लिया
मोबाइल खा गया खेल खिलौने
कंप्यूटर ने सारा प्यार  खा लिया

बाल बच्चों की सेवा करता और
उनकी खुशियों के लिये  जीता है
बच्चों संग बच्चा बन जाता "जसवंत"
जीवन का असली रस वो पीता है
 

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