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वर्ष: 3, अंक 43, अगस्त(द्वितीय) , 2018



हमारी प्रगति की दास्तान


रवि सूदन


हमने कुछ वर्षों में इतनी उन्नति कर ली है की यदि आज रावण दुर्योधन कंस आ जाएँ तो हमारी उन्नति देखकर दांतों तले उंगलिया दबा लेंगें । वो बहुत इतराते थे की हमारे जैसा कौन होगा ? काश वो आज आएं और हमारी उन्नति देखें ।

महाभारत का युद्ध तो अठारह दिन तक चला था । दस दिन तक राम रावण का युद्ध हुआ था । प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में कई वर्ष लगे तो भी विनाश नहीं हुआ । हमें गर्व है कि अब हमने बहुत प्रगति कर ली है, आज के मनुष्य ने सम्पूर्ण जगत के विनाश की अवधि केवल सात मिनट तक ला दी है । आज मानव का विनाश कितना सरल हो गया है ।

एक दिन यह भूमि बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, तत्ववेक्ताओं , और तपस्वियों से रिक्त हो जायेगी, अभी कुछ दिन पहले एक नेता जी ने कह भी दिया है की मेरा बस चले तो सभी बुद्धिजीवियों को गोली मरवा दूँ । प्रगतिशील दुनिया में ऐसी आत्माएं जन्म ले रही हैं जो क्रांति, विद्रोह, तोड़ फोड़ अत्याचार, व्यभिचार कि पोषक हैं, यह उन आत्माओं का जन्मसिद्धअधिकार है ।

आज का प्रगतिशील विश्व, अतीत के युद्धों को,कला कौशल, अस्त्र शास्त्रों को बहुत पीछे छोड़ आया है । आज ऐसे ऐसे आविष्कार ईजाद कर लिए गए हैं कि कुछ ही समय में सम्पूर्ण विश्व को मृत्यु कि गोद में सुलाया जा सकता है । आणविक भट्टियां और न्यूट्रॉन बम हमारी प्रगति की कहानियां कह रही हैं ।

रावण सीता का अपहरण कर ले गया था, सीता माता सुरक्षित वापस आ गयी थी, परन्तु अब हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं, मजाल है की कोई कन्या हाथ लग जाए और सही सलामत वापस घर जा पाए बिना अस्मत लुटाये ।

पहले डाकू चंद रुपयों की खातिर अपनी जान जोखिम में डाल देते थे, अब ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं रही थोड़ी सी अपनी साख बनाकर, बैंकों से करोड़ों रुपैये उधार लेकर आसानी से डकारे जा सकते हैं , डाका भी डालो और शान से जिंदगी भी बिताओ । पहले चोर, डाकू, बलात्कारी, हत्यारे,अध्यापक, सैनिक, संत, चेहरे से पहचाने जा सकते थे । अब सब चेहरे एक जैसे हैं कोई पति या पत्नी हत्यारे हो सकते हैं, कोई बेटा माँ या बाप का हत्यारा हो सकता है इसके लिए हत्यारे जैसा चेहरा होना जरूरी नहीं । कोई सहपाठी कोई दोस्त हत्यारा हो सकता है । हमने तकनीक इतनी विकसित कर ली है कि अपने हाथ में रखे फ़ोन से हजारों मील दूर से हम किसी की भी हत्या करवा सकते हैं । व्हाट्सअप पर ग्रुप बना कर अफवाह भर फैलाने कि देर है चंद मिनटों में रोबोट कि तरह लोग किसी व्यक्ति पर टूट पड़ते हैं जब तक कि वह मर न जाये । मारने वाले को पूरा सहयोग और मरने वाले को न्याय के बदले गालियां मिलती हैं, है ना कितनी प्रगति ?

रेप के लिए उम्र या रिश्ता , अब कोई बंधन नहीं रहा । कुत्ता बकरी तक भी चलने लगा हैं । बलात्कारी व्यक्ति नाबालिग से लेकर ८० साल तक का बुजुर्ग किसी भी उम्र कि कुछ महीने कि बच्ची से लेकर ७०-८० तक की महिला से यह काम आसानी से करने लगा है समाज के सुसंस्कृत व्यक्ति, बाबा, अध्यापक, नेता, सगे सम्बन्धी समाज के इज्जतदार व्यक्ति अब कोई भी इस काम को गिरा हुआ नहीं समझते । हमने इतनी प्रगति कर ली है कि पकडे जाने पर ग्लानि जैसी भी कोई चीज अब नहीं रही । अभी अभी अपनी प्रगतिशीलता रेप के मामले में भी सबने देखी, रेप करके रिस्क लेने की जरूरत नहीं, एनजीओ के मार्फ़त बेसहारा कन्याओ के कल्याणार्थ आश्रय बनाओ फिर उन एक नहीं अनेकों कन्याओ के साथ शासन की नाक के नीचे आसानी से रेप करो । यदि पकडे भी गए तो कई वर्ष तक मामला कोर्ट में लटका रहेगा सभी कुछ समय बाद इसे भूल जायेंगें ।

हमारी प्रगतिशीलता की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है, मैरी काम पूरे जीवन में इतना नहीं कमा पाई जितना उसके नाम और काम से एक फिल्म में काम करके प्रियंका चोपड़ा ने कमा लिया । अब हत्या रेप करके बच जाना भ्रष्टाचार में लिप्त होना, लाखों से करोड़ों, करोड़ों से अरबों बनाना , बुरी बात नहीं चुटकी बजाने जैसा काम है, मेहनत से कम परन्तु यदि आप किसी नेता के लाडले हो तो इस काम में आपको बहुत आसानी होगी । शर्त यह है की आप सत्ताधारी पार्टी में होने चाहिए फिर तो आपको गंगा में भी नहाने की जरूरत नहीं ।

पहले बच्चे खेल के मैदान में जाकर खेलते थे, कई दोस्तों की जरूरत होती थी मैदान की जरूरत होती थी, अब दोस्तों की क्या जरूरत, मैदान से क्या लेना देना ? अब तो हाथ में एक फ़ोन ही काफी है ।पहले लोग संयुक्त परिवार में रहा करते थे प्रगति इतनी हुई की अब ठाठ से एक दो बच्चों के परिवार के साथ रहते हैं । ना माँ बाप का टेंशन ना भाई बहनो, रिश्तेदारों की जिम्मेवारी, टीवी और फ़ोन ने हमें पूरी दुनिया के करीब ला दिया है हमारे बच्चे घर में ही पूरा दिन बिताते हैं, हमने इतनी प्रगति कर ली है की हमें अब किसी के सहारे की जरूरत नहीं रही ।

अब कोई सज्जन जैसा दिखने वाला व्यक्ति बलात्कारी या खूनी हो सकता है । अध्यापक सिर्फ पढ़ाई ही करवाएं कोई जरूरी नहीं, वे विद्यार्थियों से अपने घर के काम अपनी कार भी धुलवा सकते हैं । पढ़कर ही कोई विद्यार्थी डाक्टर या इंजीनियर बने जरूरी नहीं, पैसे देकर भी परीक्षा में अव्वल आ सकते हैं । पहले राजा के काम से राजा पहचान जाता था, अब प्रचार से अपने गलत काम को सही प्रचारित किया जाता है ।

काम की उतनी जरूरत नहीं रही जितना प्रचार की ।

मुझे तो कवि प्रदीप की यह पंक्तियाँ याद आती हैं “देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गयी भगवान्, कितना बदल गया इंसान , सूरज न बदला चाँद न बदला ना बदला ये आसमान कितना बदल गया इंसान ।


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