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वर्ष: 3, अंक 43, अगस्त(द्वितीय) , 2018



रक्षा बंधन


शुचि 'भवि'


कुमुद मिठाई खरीदने गयी थी,वापसी में मेंहदी भी ले आयी।

घर में क़दम रखा ही था कि आरती की फ़रमाइश शुरू,दीदी राखी तो नहीं लायी हो न, मैं कल ख़ुद जाकर लाऊँगी, आपकीं राखी जीतू भैया को पसंद भी नहीं आएगी,कल किरण दीदी भी आ जायेंगी फिर हम दोनों ले आयेंगे, आप मिठाई तो लायीं हैं न,और मेंहदी,वो मैंने क्लिप भी कहे थे न पीले रंग के और,। बस करो आरती, कुमुद ने कहा और काम पर लग गयी।

6 साल पहले शादी हुई थी कुमुद की।बेहद आलीशान शादी,मगर उतने आलीशान लोग नहीं मिले थे उसे, चार साल से मायके में ही है और अब कुमुद के बिना तो उसकी भाभियाँ भी नहीं रह पातीं, नींव हो मानो कुमुद इस घर के हर रिश्ते की।कुमुद,आयकर विभाग में एक बड़े ओहदे पर कार्यरत है।

किरण की शादी को 3 वर्ष हुए,शादी की धूमधाम से अधिक फटाके रोज उसके घर में फूटते।लोभी परिवार मिला,स्वयं नौकरी करती है किरण मगर कुमुद जितनी स्ट्रांग नहीं है।एक साल का बेटा राहुल ही अब उसकी ज़िंदगी है ।उसकी ख़ातिर ससुराल घर के सभी अत्याचार वो सहती रहती है।

आज किरण को आना था मगर अपनी नन्दों के लिए त्यौहार के पकवान बना रही है वो, इसलिए नहीं आयी।कल आएगी, राखी के दिन ही।

रात के 10.30 बज गए,जीतू अभी काम से लौट कर हाथ-मुँह ही धो रहा था कि फ़ोन पर कुमुद के चिल्लाने की आवाज सुन वो उधर ही दौड़ा।

अब तक कुमुद फ़ोन रख चुकी थी और जीतू से कह रही थी कार निकालो,किरण को लेने जाना है।

कार में किरण के जलने की बात उसने जीतू को बताई।कैसे क्या कुछ भी नहीं पता था दोनों को ही, मगर इतना विश्वास था कि किरण आत्मदाह नहीं कर सकती।

जीतू ने गाड़ी पुलिसथाने की ओर मोड़ ली थी।कुमुद के समझाने पर रोते हुए जीतू ने अस्पताल का रुख किया।

किरण ने आँख खोल जीतू से बस इतना कहा था मुझे घर ले चलो कल राखी का त्यौहार है न, राहुल को भी ससुराल से ले आओ भाई, और बेहोश हो गयी थी।

डॉक्टर के पास हवा की गति से दौड़ा था जीतू।

अपने जीजा की तरफ़ देखना भी नहीं चाहता था वो।कल ऑपेरशन करेंगे, 80% जल गई हैं,बस इतना ही तो कहा था डॉक्टर ने।

रात बीती सुबह हुई,रक्षाबंधन आज और जीतू सोच रहा कि इतने साल किरण की राखी का क्या मोल दे पाया वो, इन हैवानों से उसकी रक्षा भी नहीं कर पाया।अब नहीं जाने दूँगा उस नरक में किरण को।

जीतू,मेरी राखी कहाँ है,किरण की आवाज़ से वो चौंक गया था।

कुमुद,आरती दोनों को ही घर भेजा था उसने अभी।माँ को कुछ भी न बताने की हिदायत देकर और अपनी भाभी को अस्पताल तुरंत भेजने का कहकर।

किरण की आवाज काँच के चैम्बर से बाहर उसे कैसे सुनाई दी,यह आश्चर्य था,जीतू ने नर्स को बुलाया।किरण के पास नर्स को बैठाकर वो साथ वाली दुकान से राखी ले आया।

कल्पना,उसकी पत्नी भी अब तक आ गयी थी।डॉक्टर ने ऑपेरशन फॉर्म उसके जीजाजी से अब तक सही करा लिया था।

किरण आँख खोल कुछ कह रही थी जीतू को,जीतू ने राखी उसके कांच के चैम्बर में लेजाकर उसकी आँखों से छुआ कर बाँध ली थी।

किरण फिर बेहोश हो गयी थी और उसी अवस्था में ऑपेरशन टेबल से ही रुख़्सत हो गयी सदा के लिए।

जीतू सोचता ही रहा विदा की बहन को घर ले आता वो कुछ पहले ही,तो आज शायद यूँ विदा न करता पड़ता।

समाज,रिश्ते,रीति-रिवाज़ सबसे ऊपर उठ बचा पाता शायद वो अपनी किरण को।

दहेज दानव तो पढ़ाई-लिखाई ,सुंदरता,शालीनता कुछ भी नहीं देखता,निगल ही लेता है सब कुछ ही, आज़ादी के 70 साल बाद भी वो।

समाज,कानून कुछ भी तो किरण के स्नेह सूत्र से बड़े नहीं हो पाये,वो जाते जाते भी भाई को रक्षा सूत्र बाँध आशीष दे ही गयी।


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