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वर्ष: 3, अंक 43, अगस्त(द्वितीय) , 2018



गुरु-शिष्य


राजीव कुमार


सड़क पर चल रहे एक व्यक्ति के आगे अचानक आकर दीपक ने कहा, ‘‘प्रणाम सर!’’

उस व्यक्ति ने अपना चश्मा चढ़ाया और पहचानने की असफल कोशिश करते हुए पूछा, ‘‘मैंने तुम्हें पहचाना नहीं, तुम हमको कैसे जानते हो?’’

‘‘सर, मैं बचपन से आपका छात्र रहा हूं, कटिहार मीडिल स्कूल से।’’

‘‘तुम कटिहार मिडिल स्कूल में पढ़ते थे?’’

‘‘हां, सर।’’

‘‘तुम्हारा चेहरा हमको याद नहीं आ रहा है। राजेश का चेहरा याद है, विवेक का याद है, प्रदीप का याद है, मगर तुम्हारा...।’’

दीपक ने चेहरे पर अफसोस का भाव लाते हुए कहा, ‘‘सर, आप हमको नहीं पहचान पाएंगे। मैं अच्छा स्टूडेंट कभी नहीं रहा। मैं बैकबेंचर था। हमेशा प्रमोटेज से पास होता रहा, लेकिन मेरा नाम जब स्कूल से कटने वाला था तो मेरी फीस आपने भरी थी, जिसके चलते मेरी पढ़ाई लगातार जारी रही। आपका वह अहसान कभी नहीं भूलूंगा।’’

उस व्यक्ति ने कहा, ‘‘तुम्हारा चेहरा तो याद नहीं आया, लेकिन इसमें एहसान की क्या बात है, वह तो मेरा फर्ज था।’’

‘‘हां सर, आपका ही तो सिर्फ फर्ज था वरना ज्ञानेश्वर झा और परमेश्वर पासवान सर तो दांत निपोरकर हंस रहे थे।’’

गुरु जी को झा सर और पासवान सर के नाम से आभास हुआ कि ये लड़का सच बोल रहा है।

गुरु जी ने पूछा, ‘‘यहां दिल्ली में क्या कर रहे हो?’’

‘‘गुरु जी, छोटा-मोटा उद्योग है, दाल-रोटी चल जाती है।’’

‘‘और सर, आप यहां कैसे?’’

‘‘नौकरी छूटने के बाद बेरोजगार घूम रहा हूं। यहां बेटे के पास आया था, मगर उसका तो अपना ही रोना है।’’

‘‘गुरु जी आप मेरे साथ चलिए।’’ दीपक ने गुरु जी के पांव छूते हुए कहा।

दीपक ने अपने कारखाने में क्लर्क की नौकरी दे दी। ए.सी. रूम में घुमावार कुर्सी पर बैठते ही गुरु जी की आंखें यह सोचकर नम हो गईं कि मैंने इसकी फीस सिर्फ दस रुपए भरी थी और उसने पंद्रह हजार रुपए की नौकरी दे दी। उसी स्कूल का पंकज पांडेय जिसको मैंने खूब पढ़ाया और बहुत बड़ी कंपनी में इंजीनियर है, उसने देखते ही नजर फेर ली और तो और मेरा नालायक बेटा जिसकी पढ़ाई में लाखों रुपए खर्च किए, उसने दाने-दाने को मोहताज कर दिया।


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