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वर्ष: 3, अंक 43, अगस्त(द्वितीय) , 2018



दलित की दीवाली


अंकित भोई 'अद्वितीय'


दीवाली की अगली सुबह उमेश अलसुबह घर के सामने बाग में घूमते हुए ब्रश कर रहा था, तभी अचानक उसकी नज़र एक छोटे बालक दल पर पड़ी जो कभी यकायक प्रसन्न होकर उत्साह गर्जना करते तो कभी स्वतः ही शांत हो जाते। ये वही बच्चे थे जो अक्सर उसकी कार में जमी धूल पर अपनी उँगलियों से कारीगरी के नए-नए नमूने छोड़ जाते थे पर अचानक आज उनका इस तरह बदला हुआ व्यवहार देख कर पहले तो उमेश को थोड़ा अचरज हुआ पर जैसे ही उसने गौर फ़रमाया कि मामला थोड़ा गंभीर है, उसने कारण पता करने की ठान ली। सभ्य व सुसंस्कृत व्यक्तित्व के धनी उमेश को जिज्ञासु प्रवृत्ति विरासत में मिली थी, वह बिलकुल अपने शिक्षक पिता की तरह सरल व दयालु प्रवृत्ति का था। वह बच्चों के करीब गया तो उसने पाया कि वे दलित वर्ग के बच्चे पिछली रात के अधजले पटाखों को पाकर, बड़ी शिद्दत से उसके ज्वलनशील तत्व को एक गंदे काजग में बटोर रहे थे, इस कार्य में उनकी तन्मयता ऐसी थी मानो को वैज्ञानिक गहन अनुसन्धान कर रहा हो, असली मायने में उन बच्चों की दीवाली तो यही थी। चिर भावुक उमेश कुछ पल के लिए भावनाओं के सैलाब में बह गया और उसके आँखों में आंसू आ गए। तभी वह जाकर फौरन ही बाजार से कुछ मिठाईयां व पटाखे ले आया व उन बच्चों में बाँट दिया। ये वक़्त उमेश के लिए भी किसी दीवाली से कम नहीं था। तब से लेकर आज तक उमेश के लिए दीवाली सहित अन्य त्यौहारों के मायने बदल गए हैं। अब उमेश अकेला नहीं है एक बाल-समूह हर त्यौहार में उमेश की ख़ुशी व जश्न का हिस्सा बनता है।


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