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वर्ष: 3, अंक 43, अगस्त(द्वितीय) , 2018



गाँव


रामदयाल रोहज


 
गाँव के पश्चिम में पसरा
निर्मल जल से तालाब भरा
शिथिल पड़ी ऊर्मियाँ चली
लेकर वायु से पान सुरा  |
चहुँओर हरी दूर्वादल के
बिस्तर पर सारस बैठे हैं
मानों मेहमान पधारे हैं
मित्र से करने भेंटें हैं |
नहा ओसकण से सूरज
लो कंघा - अनिल उठाए
मुख देखे सरवर - दर्पण में
अपनी जुल्फें सुलझाए  |
तट  पर  खड़ी   बबूलों  ने
ओढी ओढनियाँ पीली
ज्यों बहुएँ लेने आती;  पूत
जन्म पर प्रथम पानी   |
दादुर गाते गीत नये
सुन जुगनू धूम मचाते
कुछ पल बगुले संत बने
बन्द लोचल ध्यान लगाते |
और पास ही पालों पर
टिटहरी पंख फैलाए
सेती अण्डे भूखी प्यासी
कंकर आसन्न जमाए |
 

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