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वर्ष: 3, अंक 43, अगस्त(द्वितीय) , 2018



प्रीत का रोग ...


कवि जसवंत लाल खटीक


  
प्रीत का रोग लगा मुझे , नींदे उडी रात की ।
तुम अलबेली शाम हो ,  मेरे प्यारे गाँव की ।।

प्रेमरस में खो जाता , इंतजार में कटे रतिया ।
हे खुदा उससे मिला , बरसती है ये अंखिया ।।

चाँद देख उसे याद करू , तारों की मैं सैर करु ।
तेरे प्यार में पागल हूँ , सपनो में तेरी मांग भरु।।

तेरी एक झलक पाने , दिन भर मैं राहे तकता ।
पागल प्रेमी आवारा मैं ,खाना पीना भी तजता ।।

तुझसे मैं आँखे मिलाता , शर्म से नैन झुक जाते ।
कोमल हाथो के स्पर्श से,रोम-रोम मेरा महकाते।।

तेरे ख़ातिर जीवित हूँ मैं , तेरे ही सपने बुनता । 
चलता अगर मेरा राज , हमसफ़र तुझे चुनता ।।

सुनो तुम मेरी बन जाओ, परी बना कर रखूंगा ।
जीवन के इस सफर में,पलकों पे बैठा के रखूंगा।।

बारिश का मौसम सुहाना , आ गयी बरसात भी ।
तुम आ जाओ ना सजनी , देर है किस बात की ।।

जसवंत का जीवन अधूरा ,आस तेरे साथ की ।
तुम अलबेली शाम हो , मेरे प्यारे गाँव की ।।

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