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वर्ष: 3, अंक 43, अगस्त(द्वितीय) , 2018



हाइकू


अशोक बाबू माहौर


 
1.
सबेरा नहीं रात अंधेरी खूब चलना नहीं।
2.
पहाड़ ऊँचा देखूँगा अब कैसे गर्दन थकी।
3.
भोला है मन डाँटते लोग मुझे झेलता दुख।
4.
सड़क सूनी दम भरती आँखें थकी जुबान।
5.
पैदल हम गाते गीत पुराने पथ हसीन।

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