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वर्ष: 3, अंक 43, अगस्त(द्वितीय) , 2018



चर्चे शहर में अब ये आम हो गए हैं


बृजेश पाण्डेय 'बृजकिशोर'


 
चर्चे शहर में अब ये आम हो गए हैं,
मुहब्बत करने वाले तमाम हो गए हैं।

प्रेम का दरिया बिस्तर में बह रहा है,
जिस्म से खेल तो सरेआम हो गए हैं।

चश्मे नूर के  हमीं  गुलाम  हो  गए हैं,
मयकदों में पीने के इंतजाम हो गए हैं।

प्यार के पैमाने सारे टूट चुके हैं अब,
इश्क में रोज कत्लेआम हो गए हैं।

रुख़ हवाओं के बेसर्द हो गए हैं अब,
शबनमी झोंकों के रुख़ जाम हो गए हैं।

कीचड़ के दाग़ सरेराह लग गए हैं,
संगदिल के ऐसे इंतजाम हो गए हैं।

नाम वाले अब  बदनाम  हो गए हैं।
गाँवों में भी अब यही काम हो गए हैं

पंचनीति राजनीति से हो गयी है प्रेरित,
कोशिशें नेकियों के नाकाम हो गए हैं।

संजीदा सारे अब तो अवाम हो गए हैं,
जुर्म में बृजेश शामो सुबह हराम हो गए हैं।		 
 

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