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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



अरे बावरे...


-विश्वम्भर पाण्डेय "व्यग्र"


 
भौर सुहानी
कहे कहानी
सुखी रहे
हर इंसानी
सूरज सबका
चंदा सबका
बाँट न सकते
हिस्सा नभ का
छोड़ जायेगा
तोड़ जायेगा
बंधन सारे
अरे बावरे...
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जो खेता है
बिन पानी के 
नाव हमारी
कभी विचारी
खोजा उसमें
जिसमें लय सब
समझेगा कब
तेरा जीवन 
कृपा है उसकी
हर पत्ता हिलता
कृपा से जिसकी
आस पास है
वो ही खास है
अनुभूति कर
क्यूँ निराश है....
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जड़ चेतन में
तन में मन में
हर कणकण में
विद्यमान है
सुबह में वो
और शाम में
अल्ला में वो
और राम में
हर हलचल में
हर पलपल में
आज में भी
रहेगा कल में
जो कारण है
बनने का भी
मिटने का भी
जो कारण है
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बनना मिटना
उसकी इच्छा
कारण जो भी
आये उसको
समझ परीक्षा
जितना जीवन
जीले उसको 
जाना एक दिन
तय है सबका
सो के जागो
अरे अभागो...
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