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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



मै भी बन सकती हूँ सीता, पर नही


डा. रानू मुखर्जि


  
मै भी बन सकती हूँ सीता पर नही                         
नही सहूँगी  अकारण मै लोगों की बाते भली-बुरी
नही बनूँगी राम की अनुगामिनी बनना चाहूँगी सहचरी
    नहीं बनने दूँगी अपने परिवार को किसी मन्थरा की मन्त्रणा का शिकार
    नहीं मरने दूँगी दशरथ को सहकर अपने वर का प्रहार
अचानक छोड राजपाट क्यूँ भटके राम वन-वन
संस्कारी होने की दुहाई दे नहीं रहूँगी तब मौन
      मांगूगी न्याय समाज से क्या अग्रज होने का अर्थ है केवल विसर्जन
      मैं भी बन सकती हूँ सीता पर नहीं
नहीं बनने दूँगी अपने राम को किसी सरुपनखा  का शिकार     
रहूँगी सहचरी बन डोलूँगी सहचरी बन हरदम उनके आसपास
     नही करूँगी हठ स्वर्ण हिरन के लिए
     अगर किया भी तो जाऊँगी संग उसे पाने के लिये
क्यूँ रहूँ घेरे मे बन्द खींची गई लक्ष्मण रेखा के मध्य
मैं भी हूँ समर्थ इतनी कि खींच सकती हूँ रेखा किसी को रखने के लिये मध्य
     डर-डर कर क्यों दूँ भिक्षा 
पहचान कपटी को क्या नहीं कर सकती अपनी रक्षा 
तन मे आग मन मे आग रावण के लिए मेरे हर कर्म मे आग
      विनती सुन लो अबके हे सीतापति राम
      हो उदय विश्व मे नारी के प्रति सम्मान
      अबसे न हो किसी नारी का अपमान
      किसी नारी का अपमान
      मै भी बन सकती हु सीता पर नही                           
 


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