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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



ज़रा-सा बहक जाना चाहता हूँ


प्रेम एस गुर्जर


 		 
ज़रा-सा बहक जाना चाहता हूँ,
यूँ जीवन-भर संभल-संभल कर चलना, 
मुझे अच्छा नहीं लगता।

मजबूरी हैं कि इतना गंभीर हूँ, वरना
हँसना किसे अच्छा नहीं लगता?

जीवन पथ हैं दुर्गम,
काँटों पर चलो तो मिलता हैं मुकाम, वरना
फुलों का हार किसे अच्छा नहीं लगता?

एक बार गिर जाने दो मुझे,
यह ठोकर ही ले जायेगी आगे, वरना
संभल-संभल कर चलना किसे अच्छा नहीं लगता?

अगर चलना ही मुकद्दर में हैं मेरे तो,
बेशक चलूँगा,
चलता ही रहूँगा, वरना
जरा-सा ठहरना किसे अच्छा नहीं लगता?

जरा-सा बहक जाना चाहता हूँ 
यूँ जीवन-भर संभल-संभल कर चलना
मुझे अच्छा नहीं लगता ।।

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