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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



फिर भी हर कोई मरता है


डॉ० अनिल चड्डा


 		 
कोई मरना नहीं चाहता है 
फिर भी तो मरना पड़ता है 
जो जीना नहीं चाहता है 
फिर भी तो जीना पड़ता है 
इस दुनिया के रंगों को, लेकिन 
कोई नहीं समझता है 
ये कुदरत खेल खिलाती है 
किसी से हमको मिलवाती है 
कोई साथ में चलता रहता है 
कोई बीच राह बिछड़ता है 
कोई यादें मीठी देता है 
कोई कड़वी बातें करता है 
कोई भावुक हो कर तड़पता है 
कोई वार भावना पर करता 
फिर भी ये जीवन चलता है 
फिर भी जीना पड़ता है 
पर अंत में मरना पड़ता है 

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