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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

मेरी हस्ती पछाड़ दी...

सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता "

आज उसने यों मेरी हस्ती पछाड़ दी लगा उसने तो मेरी दुनियां उजाड़ दी अफसाना था अनकहे अल्फाज़ो का उसकी ख़ामोशी ने कहानी बिगाड़ दी ख्यालों की झील सतत बह रही थी उसने आकर झील में कंकर मार दी उस पेड़ पर मौसमी फूल लगे थे हुआ क्या उसने आके शाख झाड़ दी ख़ुशी की दरखास्त मैंने भी लगाई थी उसने जान-बूझके मेरी अर्ज़ी फाड़ दी मैंने तो अपना हर काम अच्छा किया उसे क्या लगा बीच में कमी काड़ दी कहने को तो वो मेरे दोस्तों में से था दोस्त बन जिस्म में खंजर उतार दी मेरे जीते-जी वो नाराज़ रहे मुझसे मेरे मरे बाद रूह को लात मार दी मैं रुख़सत हुआ ज़िन्दगी से "उड़ता" उसने देके मौत मेरी ज़िन्दगी संवार दी.

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