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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

कैसी आग उगलते लोग

नरेन्द्र श्रीवास्तव

कैसी आग उगलते लोग। कैसी हाय निगलते लोग।। शीत ऋतु के अंगारों से। कैसे मौन सुलगते लोग। बुनते जाल जो औरों को। खुद ही जा के फंसते लोग।। क्या-क्या सितम ये कर जाते। कितने गहरे धंसते लोग।। ये दंभ है,अहं वहम है। मन ही मन फिर हँसते लोग।। अपनी ही करतूतें देख। देखो कैसे उछलते लोग।। गिरो अगर, संभलो फौरन। घर के सयाने कहते लोग।। देश सब का रहें प्रेम से। ऐसी आस भी रखते लोग।।

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