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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

मिल गये हमको दोबारा रास्ते

डॉ० अनिल चड्डा

मिल गये हमको दोबारा रास्ते भटके हुए, फिर भी जाने हम तेरी गलियों में क्यों अटके रहे ! जिनकी चाहत में हमेशा हम रहे मदहोश थे, उनकी आँखों में ही जाने क्यों हैं रड़के हुए ! वो गुनाह करते रहे, हमको सज़ा मिलती रही, प्यार को फंदा बना फाँसी पे लटके रहे ! जीत जाने से भी क्या हुआ हासिल हमें, ता-उम्र अपनों से ही बेसबब कटके रहे ! किश्ती बना कागज़ की, मँझधार से लड़ने चले, साहिल पे ही डूबने के पर खटके रहे ! तुम हमारे पास थे, हम भी तुम्हारे पास थे, अपने-अपने अहँ के चलते पर बँटके रहे ! जितना लम्बा था सफर, उतने ही छोटे रास्ते, टकराव से डर कर, वो मेरी राह से हटके रहे !

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