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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

खामोश रहने दो

अभिषेक रंजन "कहानी"

इस चाँद से चेहरे को मेरे मुक़ाबिल रहने दो यारों हिज़ाब उठा दो बस नक़ाब रहने दो सर-ए-बाज़ार-ए-ज़र मेरे ग़म को मुश्तहर मत करो यारों इस संग-दिल दुनिया को बेख़बर ही रहने दो ता-उम्र साथ देने का वादा तो किया है उसने मगर कोई कुछ समझायेगा और वो कहेगी यार रहने दो आज अंगारों को चुम कर सोना है मुझे यारों मेरे हाथ में खाली पैमाना रहने दो अब तो सांस छोड़ने पर भी फतवे जारी होते हैं क़सीदे क्या लिखे यारों गूंगे-बहरों की रहने दो अगर "कहानी" सुनोगे तो उसे हर्फ़-ए-गलत समझोगे क्यों करे उसे बदनाम यारों मुझे खामोश ही रहने दो

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