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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

ताकि हम पुस्तकों की तलाश में निकलें

उत्तम सिंह ठाकुर

पुस्तक ने मानव का साथ प्राचीन समय से ही परिवर्तन क्रांति तथा मूल्यों की रक्षा में दिया है कभी पुस्तकें धार्मिक बनी, उनको सुनते या देखते ही मानव मात्र का सिर स्वतः ही झुक जाता था तो कभी किसी क्रांति का कारण बनने के कारण विवाद का मुद्दा भी बनी। पुस्तक लिखने वाला ऋषि था, या तो कल्पनावादी लेखक।

पुस्तक को लिखने के लिए कभी गणेश, व्यास जी के साथ बैठे तथा कभी मुहम्मद साहब को इल्हाम हुआ। कभी विचारधारा को फैलाया तो कभी फैलने से रोकने के लिए अस्तित्व में आयी, पुस्तक कभी भड़के मनुष्य को शांति देती है तो कभी आत्मिक रूप से सोये व्यक्ति के खून को गरम करती रही। कईयों को जान के लाले इसलिए पड़े क्योंकि उन्होंने लीक से हटकर पुस्तकें लिखी।

हमारे देश में जन्म के समय पुस्तक पाठ, शादी के मंत्रोचारण, यज्ञोपवीत में तथा मृत्यु के समय पुस्तक साथ होने के बावजूद पुस्तकप्रेम आखिर क्यों कम हो रहा है? पुस्तक प्रकाशन तथा वितरण विक्रय और लाभ के नियमों से जुड़ गया है, अधिकतर ऐसे समूह का उद्देश्य पाठक को मात्र खींचना ही है! शायद ही कभी किताबों के विषय या समाज पर पड़ने वाले प्रभावो से कुछ लेना देना हो। वैसे भी थोक सप्लाई व् एक मुश्त भुगतान की सुखद सुविधा आदि होने के कारण भला क्यों कस्बों व् गावों की धूल में छिपे फुटकर पाठक की याद आएगी।

जो पुस्तक से जुड़े पाठक हैं वे भी मात्र भावुक हो गए। जब किसी घर में बचा पैदा होता है तो भारत में सभी ऐसे घरों में बचे के लिए जरूरी खिलौने तथा कपडे दिए जाते हैं शायद ही कोई माता पिता हों जो अपने बच्चे के जन्म के साथ ही घर में पुस्तक लाता हो । ऐसा नहीं है कि बच्चा तभी ही पढ़ने लगेगा , परन्तु जब तक पढ़ने लगेगा तब तक पुस्तकों का एक अच्छा संग्रह बन सकता है।

हम पुरस्कार स्वरुप भी धन या प्र्शस्ति पत्र तो देते हैं परन्तु अच्छा हो कि साहित्य के क्षेत्र में व् शिक्षा के क्षेत्र में पुरस्कार स्वरुप ऐसे व्यक्तियों को पुस्तकों का संग्रह दिया जाये। ऐसे बहुत से अध्यापक हैं जिनके पास पुस्तक संग्रह तो है परन्तु वह पाठ्यक्रम तक ही सीमित है, उनके घरों में बाकि सभी सुविधाएं होती हैं परंतु वास्तविक ज्ञान कोष नहीं होता।

पुस्तक मेले राज्य की राजधानियों व् देश की राजधानी में आयोजित किये जाते हैं, आखिर क्यों न इन्हे जिलास्तर या उपमंडल स्तर पर आयोजित किया जाये। अच्छे उपन्यासों, बालसाहित्य, अनुवाद साहित्य को आखिर ग्रामीण पाठक कहाँ से पाएं। साहित्य व् शैक्षिक रुझान वाले व्यक्तियों को मिल कर पुस्तकालय बनाने के लिए कटिबद्ध होना होगा। जो दानी व्यक्ति भवनों के लिए, सड़को के लिए, मंदिरों के लिए दान देते हैं उन्हें पुस्तकालय दान की तरफ भी ध्यान देना होगा। पुस्तक पढ़ें तथा औरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करें। वर्तमान समय इंटरनेट का है परन्तु पुस्तकालयों का महत्त्व आज भी अप्रसांगिक है पुस्तक सोच बदल सकती है। पुस्तक जीवन के उद्देश्य को पूरा कर सकती है तथा कई बार पुस्तक आप को वह भी बता सकती जिसे आज तक किसी ने बताया न हो।


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