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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

मजदूर

सुरेश सौरभ

प्रधानाचार्य की बात से जब वह संतुष्ट न हुआ, तो वह सीधे प्रबंधक के पास पहुंचा। सामान्य शिष्टाचार के बाद बड़े उदासी भरे लहजे में बोला-साहब जी तीन माह बीत चुके हैं धीरे-धीरे चौथा माह भी जा रहा है। मानधन न मिलने से परिवार का निर्वाह होना मुश्किल होता जा रहा है। जहां-तहां से मांग-मूंग के बस काम ही चला रहा हूं।’

उसकी पूरी बात सुन प्रबंधक बेहद नरमी से बोले-तुम लोग सब जानते हो कि प्राइवेट कालेज में तुम्हारे और कालेज केे सारे खर्चें सब बच्चों की फीस से ही निकलते हैं। फीस हम लोगों की फंसी पड़ी है। आधी परीक्षाएं बच्चों की बाकी पड़ी हैं। यहां हम लोग खुद माइनस में चल रहे हैं, तुम लोगों को क्या दें। धैर्य रखो। हो सकता है, सरकार जल्द ही हम लोगों को कालेज खोलने का आदेश दे दे। पता नहीं क्या है। 70 दिनों की तालाबंदी के बाद सब कुछ खुल गया, लेकिन पता नहीं ये कालेज कब सरकार खुलवायेगी।

’मैं तो पिछले पन्द्रह सालों से आप की संस्था में सेवा कर रहा हूं। इतनी बड़ी प्रतिष्ठित आप की संस्था है, आप कुछ तो करें साहब जी। वह अनुनय करने हुए लरजते शब्दों में बोला।

’ठीक है कालेज खुलने दो। धैर्य रखो, कुछ न कुछ जरूर आप लोगों के लिए करेंगे।’

प्रबंधक का आश्वासन पाकर वह थके-थके बोझिल कदमों चला, कालेज के गेट के बाहर निकलते ही गेट के पास ही बडे़-बड़े लगे बालू मौरंग गिट्टी के़े ढेरों को देखा, जिन्हें मजदूर ढो-ढो कर कालेज की दूसरी मंजिल पर ले जा रहे थे। जहां तीसरी मंजिल का निर्माण कार्य जोरों से चल रहा था। वह एकाएक ठिठक गया। फावड़े से तसले में मौरंग भर रहे एक मजूर से बड़े धीमे से बोला-साहब जी पैसे-वैसे दे रहे भाई ! या तालाबंदी का बहाना करके टरका रहे हैं।’

वह थोडा मुसकुरा कर ऐंठ में बोला-और क्या यहां सेंतमेत जूझ रहें हैं। जब लाखों करोडों बिल्डिंग में फूंक सकतें हैं, तो हमारी मजदूरी रोक कर क्या करेंगे।

मजदूर की ऐंठ में साफगोई से भरा टका सा जवाब पाकर, कई सुइयां उसके पूरे दिमाग में एकदम से चुभने लगीं। बड़े दुःख और क्षोभ में अपने आप में ही बुदबुदाया-पता नहीं ये कालेज-वालेज कब खुले.... पता नहीं पूरा पेमेन्ट दें या न दें ...प्राइवेट टीचर से बेहतर था कि हम भी ऐसे ही मजूर होते ?


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