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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

अब इसे क्या कहेंगे ज़नाब

डॉ आर बी भण्डारकर

घोर गरीबी में एकाकी जीवन यापन कर रही वृद्धा झुकिया ने चैत(रबी की फसल)कटते समय सिला बीन कर खाद्यान्न की व्यवस्था तो कर ली पर भोजन पकाने के लिए ईंधन भी तो चाहिए।

ईंधन के लिए खेतों में से "आइनी कंडियाँ " बीनने के लिए आज झुकिया घर से निकली।

दूर दूर के खेतों से कंडियाँ बीनकर ठाकुर के खेत की मेड़ पर से होकर वह घर लौट रही थी,कंडियों वाली झोली के बोझ के कारण झुककर धीमे चल रही थी,कि रास्ते में ठाकुर साहब मिल गए;छूटते ही बोले-

"झुकिया तूने इतनी सारी कंडियाँ बीन लीं मेरे खेत में से।...शर्म नहीं आती है।...मैं रोज शाम को गायों को घेर घेर कर बैठाता हूँ खेत में ताकि वे खेत में गोबर करें जिससे खेत को कुछ खाद मिल जाये पर तुम निम्न लोग अपनी हरकत से बाज नहीं आते।"

उम्र में छोटे ठाकुर ने अकारण ही झुकिया पर इतनी बड़ी तोहमत लगा दी ; तो पहले तो वह सन्न रह गयी;फिर कुछ सम्हल कर बोली- "लाला जी, मैं तो यहाँ से बस निकल रही थी,कंडियाँ तो मैंने बेहड़ा(बीहड़)से बीनी हैं।इस खेत में से तो एक भी कंडिया नहीं उठाई।"

झुकिया की बात सुनकर ठाकुर का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया-"झूठ बोलती है....चल फेंक सब कंडियाँ खेत में।"

इतना कहकर फिर तैश में आकर ठाकुर स्वयं ही झुकिया की झोली की सारी कंडियाँ अपने खेत में दूर दूर,इधर उधर फेंक देते हैं।

फिर झुकिया की ओर मुखातिब होकर कहते हैं- "चल भाग यहाँ से,नहीं तो ऐसा झुंड(सिर के लंबे बाल) लकलकाऊंगा कि दिन में ही तारे दिखने लगेंगे।"

झुकिया माथा पीटती है-"गरीब को कहीं ठौर नहीं।"

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शब्दार्थ:-

* सिला=फसल कटते समय खेत में गिर जाने वाली बालियाँ आदि।
** आइनीं कंडियाँ=खेतों, मैदानों,बीहड़ आदि में पशु जो गोबर करते हैं,जब वह सूख जाता है तब कुछ क्षेत्रों में वह "आइनी कंडियाँ " कहलाता है।


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