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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

हम बिल्कुल ही तो पूरे. .....

वीरेन्द्र कौशल

वो जीवन में कुबेर चाहे हम खाली जेब धनवान रहे वो ख़्वाबों में भटकते रहे हम हकीक़त में उलझते रहे वो शक्ल देख कर राज़ी नहीं हम बस दीदार को तरसते रहे वो दुनियां की शान-अो-शौकत सही हम मज़ार सी दौलत हैं वो कुतुब मिनार सी ऊँची हैसियत हम बेसमेंट से ज़मीदोज़ वो ज़लेबी सी मिठास लिये हम करेले से कड़वे हैं वो सूखे मेवे हों चाहे हम पिलपिले आम की गुठली हैं वो रंगीन सोच रखते शायद हम श्वेत शाम सी यादें हैं वो असली हक़ीक़त हों चाहे पर हम तो खोखले वादे हैं वो अपने आप में पूर्ण चाहे हम उन बिन कत्तई अधूरे हैं हम उन्हें निहारें टकटकी लगा वो बिन कारण ही घूरें हैं बस एक झलक पाते उनकी हम तो बिल्कुल ही पूरे हैं ..... हम तो बिल्कुल ही .....


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