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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

घर में वनवास

सुनील मिश्रा 'शोधार्थी'

घर में कैसा होता वनवास जाकर उर्मिला से पूछिए घर में भी वनवास होता है। मन पर पत्थर ढका रहता और उसके अंदर से अनगिनत अग्निपुंज की' लौ' घर के.... भीतर से ज्वार-भाटा देह में उठता रहता है। जीवन को अकेली जीती हूं... सुई की नोंक पर रखकर बेसुध होकर तभी तो कहती हूं... पता नहीं कौन बदलेगा, युग के मुहावरे... राम को वनवास जाने की परम्पराओं का इतिहास... ये नये युग की रामलीला अब हर घर में वनवास है।


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