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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

तुम छोड़ के जबसे गए

सृष्टि सिंह"श्रीsti"

तुम छोड़ के जबसे गए, मधुमास भी आता नहीं। अश्रुपूरित दल दीठ से ,पतझड़ विरह जाता नहीं।। दर्पण है लिपटा धूल से और अधखुलीं हैं वेणियाँ। हैं मौन धारे चूड़ियाँ और नूपुर लगतीं बेड़ियाँ। खिलती नही कलियाँ अधर,शृंगार भी भाता नहीं। अश्रुपूरित दल दीठ से ,पतझड़ विरह जाता नही।। कंटक से लगते राह हैं, भावों से झरते आह हैं। भीतर भरा घनस्याह है,मिलता नही कोई थाह है। अन्तःसलिला सम निशा,रवि रश्मियाँ लाता नहीं। अश्रुपूरित दल दीठ से ,पतझड़ विरह जाता नहीं।। अश्रुओं की वीचियाँ करती ,कपोलों पर है नर्तन। आत्म के जलयान पर , स्मृतियाँ करती है वर्तन । मन के मरुस्थल पे प्रणय का मेघ भी छाता नहीं । अश्रुपूरित दल दीठ से ,पतझड़ विरह जाता नहीं।। मुखरित नीरवता हरदिशा,निःशब्द लगता व्योम है। अतिरेक झंझावत बन कर ,हृद में लिपटा क्षोम है। विस्मृत हुआ सङ्गीत,कोकिल कण्ठ भी गाता नहीं। अश्रुपूरित दल दीठ से ,पतझड़ विरह जाता नहीं ।। पवमान के स्पर्श से , उठी सुगबुगा फिर चेतना । रक्तकणिकाओं में केवल बह रही है अति वेदना। मृतप्राय जीवन,श्वास का भी भार सह पाता नहीं। अश्रुपूरित दल दीठ से ,पतझड़ विरह जाता नहीं।।

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