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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

जानते भी हो

शुचि 'भवि'

जानते भी हो ये जो बारिश है न बड़ी गिरगिट क़िस्म की होती है बरसती है आकाश से से भिगोती है प्रेमियों को और जब वो भीग जातें हैं पूरी तरह तब आ कर ठहर जाती है नयनों में और फिर धीरे धीरे टपकती रहती है हर मौसम ही और फिर अचानक नयनों को छोड़ बन जाती है ओस की बूँद आल्हादित करती ठंडक देती जग को मगर आग नहीं बुझा पाती अपना अस्तित्व खो देती है अंततः ...........


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