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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

लक्ष्मण रेखा

शशांक मिश्र भारती

साल लगा 2020 सज गये सपने खुश हैं अपने बधाईयां दीं लीं पर यह क्या कोरोना आ गया सब कुछ खागया एक दो कितने ही दिन माह बीते छाता चला गया सब कुछ ठप्प प्रकृति का कोप विज्ञान हुआ बौना बंध गए अनचाहे सबके सब विवश हर घर द्वार पर खिंच गई मानो लक्ष्मण रेखा सपने भी टूटे हाथ हुए रीते सवाल उठा कैसा 2020 क्या लाया क्या क्या इसने हम पर ढाया काश! हम अब भी जाग जायें बहाने छोड़ मूल समस्या पर आयें एक दूसरे को दोष न देकर स्वंय संभल जायें कदाचित कुछ समाधान निकले सब पहले सा निर्बाध हो जाये पिंजड़े का पक्षी उन्मुक्त हो सके।


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