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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

यह क्या हो रहा...?

शम्भु प्रसाद भट्ट "स्नेहिल"

अफसोस कि... देश-दुनिया में आज, यह क्या करता दिखाई दे रहा...? मनुष्य से ज़्यादा, मनुष्यता का ह्रास होता दिखाई दे रहा। मानव से ज्यादा, मानवता का विनाश होता दिखाई दे रहा। इंसान से ज्यादा, इंसानियत का नाश होता दिखाई दे रहा। इंसानियत से ज्यादा, हैवानियत का विकास होता दिखाई दे रहा। अच्छाईयों से ज्यादा, बुराईयों का बोलबाला होता दिखाई दे रहा। सत्य से ज्यादा, असत्य का प्रसार होता दिखाई दे रहा। नैतिकता से ज्यादा, अनैतिकता का प्रचार होता दिखाई दे रहा। जीव रक्षा के बदले, जीवों का हनन होता दिखाई दे रहा। हाय, आज यह क्या सुनाई व दिखाई दे रहा ? एक गर्भावस्थित हथिनी को, विस्फोटक देकर बेअपराध मारा जा रहा। मानवीय संवेदनाओं का, आज समाज में ह्रास होता दिखाई दे रहा। वृद्ध मां-बाप की सेवा के बदले, परेशान कर असहाय छोड़ा जा रहा। हाय! आज समाज में यह, क्या वीभत्स रूप दिखाई दे रहा...? महिलाओं की सुरक्षा के बदले, उनका चरित्र हनन होता दिखाई दे रहा। हे परमात्मा! तेरी दुनियां में, आज इंसान का कैसा रूप दिखाई दे रहा.? चहुंओर नीति के बदले, अनीति का ही बोलबाला दिखाई दे रहा। अपने स्वार्थ के खातिर, इंसान अपनों का खून बहाता दिखाई दे रहा। हाय, अफसोस कि... देश-दुनिया में आज, यह सब क्या-क्या दिखाई दे रहा...? हे परमेश्वर! तेरी सृष्टि में आज, इंसान तुझे ही चुनौती देता दिखाई दे रहा। विकास की अंधी दौड़ में, विश्व विनाश की सोचता दिखाई दे रहा। जरा समझा अर पूछ इसे, कि तू यह सब क्यों कर रहा............?


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