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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

सावन

संतोषी वशिष्ठ

सावन के मेघ बरसने लगे घनघोर घटाएँ छाने लगी , मन को मोहने, कोयल, पपिहा मधुर धुन सुनाने लगे प्रियतम तुम्हारी याद आने लगी,, ये सावन की बारिश की बूंदों में ह्दय झूलने लगा ,। घनघोर घटाएँ गरजने लगी, आँगन में मोर नाचने लगा,, बावरा ये मन तुम्हारे मिलन को तरसने लगा,,।। धरा की हरियाली लहराने लगी, नदियाँ मधुर संगीत गुनगुनाने लगी,, आसमां में बादलों की घुटरघू होने लगी,। जम़ी पे मिट्टी की खुशबू महकने लगी, ये मन तुम्हारी यादों की बरसात में भीगने लगा, मेघों की तरह तुम भी आ जाओ, मन के आँगन को महका जाओ,,। ये गंगा जमुना की शरहदों के पार मुझे ले जाओ, उन निम॔ल जल धाराओं में इस मन को भी भिगो जाओ,,।। धडकनें ये बादलों की उमस में घुट रही हैं, हिमालय की हरियाली में इन्हें भी स्वतंत्र कर जाओ,।। ये सावन के मेघ मन को मोहने लगे, आकर गले लग जाओ, प्रेम का मधुर संगीत सुना जाओ,,।। तुम्हारी यादों की प्यास लगी हैं, कुछ बूँदें बरसा जाओ, नदियों की तरह इक नया संगम और ह्दय की धडकनों में समा जाओ,। राह इक नयी और मधुर स्नेह बरसा जाओ,, सावन के मेघ बरसने लगे, घनघोर घटाएँ छानें लगी,। सारी धरती गुनगुनाने लगी,,।। इस सावन की हरियाली में तुम्हारी खुशबू फूलों की तरह महकने लगी । साँसें थमी सी रह गयी, । ये धरती सुन्दर परिधान ओढ़े ठुमकने लगी,।। वो प्रेम की ओढ़नी ले आओ, ये रिमझिम बरसात होने लगी,,।।,, ये मन की व्यथा द्रवित हो उठी, इस बरसात की तरह तुम्हारी यादों की बरसात अश्कों से बहने लगी,। ये धरती रंग बिरंगे फूलों से सजने लगी, हवाओं के संग तुम्हारे ह्दय की महक महसूस होने लगी,, आसमां में बादलों की घुटरघू होने लगी, । जम़ी पे प्रेम की बँसुरी बजने लगी,,।।,, सावन के मेघ बरसने लगे, वो पेड़ो पे झूले लटकने लगे, ये अश्कों के मेघ जल धाराओं में बदलने लगे,, प्रेम की बूँदें ह्दय से बहने लगी, । आकर तुम भी भीग जाओ, नयनों के इन मेघों को समझा जाओ,, ये जम़ी फसलों से महकने लगी, । सुबह शाम भीनी - भीनी खुशबू चलने लगी, ये मेघों से छम छम बरसात होने लगी,,।।


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