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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

काश !

राजीव डोगरा 'विमल'

काश! मेरी जुबान की कड़वाहट के पीछे तुम मेरे हृदय की मिठास को समझ पाते । काश! मेरे मुस्काते चेहरे के पीछे तुम मेरे हृदय में दहकती पीड़ा को समझ पाते। काश ! मेरे बहते हुए अश्कों के पीछे तुम मेरे हृदय में बसी मेरी कोमल भावनाओं को समझ पाते। काश! मेरे खिलखिलाते चेहरे के पीछे तुम मेरे अंतर्मन की चीखती चिल्लाहट को समझ पाते।


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