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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

तुम कौन हो

नरेश गुर्जर

आज तुमको तुम्हारे सामने बयां करने जा रहा हूँ तुम कौन हो तुम क्या हो मैं ये कहने जा रहा हूँ शायद आज से पहले‌ तुम नहीं मिली‌ होगी ख़ुद से शायद आज से पहले तुमने नहीं देखा होगा खुद को जो कि आईना भी दिखाना चाहता है कोई कहानी तुम्हारे बारे में शायद वो‌ भी‌ सुनाना चाहता है तो सुनो कि तुम कौन हो, तो सुनो की तुम क्या हो तुम कहती हो तुम हवा हो , पर असल में किसी के जीने की वजह हो, मान हो उनका, अभिमान हो उनका, जो घर जगमगाता है तुमसे, तुम पूरा जहान हो उनका तुम्हारे माँ बाप, भाई , बहन की रगों में बसती हो तुम, उनके चेहरे पर ही नहीं, उनके दिलों‌ में भी हँसती हो तुम तुम सांस लेती हो तो सांस लेता है घर सारा, तुम आहें भरो तो तड़प उठता है हर नजारा, तुम करवट बदलती हो तो मौसम भी बदल जाता है, तुम उदास होती हो तो पत्थर भी पिघल जाता है, तुम हँसती हो तो देखी है मैंने उदास चेहरों पे रौनके होती हैं अगर आँखे नम तुम्हारी तो फीकी हो जाती हैं महलों की भी शौहरतें, तुम चलती हो तो चलता है वक्त भी, तुम थकती हो तो थक जाते हैं दरख्त भी, तुम फूलों पर बहार जैसी हो तुम सूखे में बौछार जैसी हो, तुम मझधार में पतवार जैसी हो तुम देवी के श्रृंगार जैसी हो, तुम हो धूप में भी छाया, तुम हो जीवन का साया, तुम जीवन के सार जैसी हो तुम हफ्ते के इतवार जैसी हो, गुजरती हो जिस बगिया से उसको महका देती हो तुम जीवन को भी जीवन जीना सिखला देती हो, तुम रास्तों को भी राह दिखलाती हो तुम पर्वतों में भी चाह जगाती हो, तुम शब्दों को जुबान देती हो तुम सुर को भी गान देती हो, तुम हो किसी साज से निकले मधुर संगीत सी तुम हो सदियों से निभाई जाने वाली रीत सी, तुम हो किसी मुसाफिर के सपनों की मंजिल तुम हो खुशियों से सजी कोई महफिल, तुम व्यक्तित्व के विचार जैसी तुम किसी महापुरुष के सदाचार जैसी, तुम करूणा के व्यवहार जैसी तुम माँ के दुलार जैसी तुम बच्चे के निश्छल प्यार जैसी, तुम ज्ञान के प्रसार जैसी तुम दीवाली के त्यौहार जैसी, तुम पहले प्यार के इजहार जैसी तुम पहली पहली मोहब्बत के इकरार जैसी


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