मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

हार को ही उपहार बना ले

लीला तिवानी

जश्न फिर एक नया और मना ले, हार को ही उपहार बना ले. खो गया है एक अवसर, ग़म नहीं, मिला था कोई अवसर, यह भी कोई कम नहीं! अवसरों को अपनी ओर आकर्षित करके, अवसरों का एक नया स्त्रोत बहा ले, जश्न फिर एक नया और मना ले, हार को ही उपहार बना ले. आ गया कोई नया संकट, ग़म नहीं, अनेक संकट आकर टल गए, यह भी कोई कम नहीं! हर संकट सबक कोई सिखा जाता है संकट में साहस का सागर लहरा ले, जश्न फिर एक नया और मना ले, हार को ही उपहार बना ले. असफलता का काम है आना, उसका तो है काम डराना, जो डर गया वह मर गया, इस मंत्र को अपने मन में बसा ले, जश्न फिर एक नया और मना ले, हार को ही उपहार बना ले. हार का मतलब माला भी होता है, हार मोतियों को, फूलों को एक सूत्र में पिरोता है, उपहार में भी ‘हार’ शब्द बसा है, इस शब्द को ही अपना संबल बना ले, हार को ही उपहार का पर्याय बना ले, जश्न फिर एक नया और मना ले, हार को ही उपहार बना ले. जो चाहने से मिले उसे चाहत कहते हैं, जो मांगने से मिले उसे मन्नत कहते हैं, जो जुनून से मिले उसे जन्नत कहते हैं, मन-मंदिर के अंदर ही एक नई जन्नत बसा ले, जश्न फिर एक नया और मना ले, हार को ही उपहार बना ले, हार को ही उपहार बना ले, हार को ही उपहार बना ले.


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें