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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

..फिर भी हम जगतगुरू

किसमत्ती चौरसिया 'स्नेहा'

आज जनतंत्र-धनतंत्र हो गया , सुजनतंत्र- स्वजनतंत्र हो गया। लोकतंत्र-थोकतंत्र बन गया , रामराज्य अब दामराज्य हो गया। यह प्रजातंत्र , चन्द लोगों के लिए मजातंत्र है , बाकी लोगों के लिए सजातंत्र। सस्ती के साथ मस्ती चली गयी, और लाइफ को फाइल खा गई। मूल्यवृध्दि, शुल्कवृध्दि, करवृध्दि से कष्टवृध्दि हो रहा है । अफसर अजगर के प्रतिरूप हो गए, एक बार फुफकारकर, सीधे निगल जाते हैं। हड़ताल अब हर ताल हो गया , न जाने कब ताण्डव शुरू हो जाय। भरपेट भोजन प्लेटभर हो गया, गोरस का स्थान कोरस ने ले लिया। प्रेम सट्टा बाजार का सौदा हो गया, विद्युत स्विच की भाँति, जब चाहो ऑन करो, जब चाहो ऑफ वह चरमकोटि से चर्मकोटि पर आ गया। यहाँ भाषण की अधिकता है, राशन की न्यूनता। महादेव क्षीरसागर में गोते लगा रहे हैं, कुपोषित बच्चे यमराज को गले लगा रहे हैं। क्षुधामृत्यु-वृथामृत्यु हो गई। फिर भी, हम जगतगुरू हैं, महान हैं,प्रगति पर हैं।


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